रात का सन्नाटा था, हल्की बारिश हो रही थी, और हवा में ठंडक थी। निशा अपनी बालकनी में खड़ी थी, बारिश की बूंदें उसके गालों को हल्के से छू रही थीं। तभी अचानक उसके फोन पर एक मैसेज आया—"नीचे आओ, तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।"
निशा का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। वह जानती थी कि यह कबीर के अलावा कोई नहीं हो सकता। कबीर—जिसकी आंखों में एक अजीब सा जादू था, जिसकी मुस्कान उसे बेचैन कर देती थी।
हल्के कदमों से निशा सीढ़ियां उतरकर नीचे आई। कबीर वहीं खड़ा था, भीगा हुआ, लेकिन उसकी आँखों में वही पुरानी चाहत थी।
"बारिश में भीगना अच्छा लगता है?" निशा ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
"अगर तुम्हारे साथ हो, तो हाँ," कबीर ने धीरे से कहा।
निशा ने महसूस किया कि कबीर की निगाहें उसे भीतर तक भिगो रही थीं, जैसे बारिश की ये बूंदें सिर्फ़ बाहर से। वो कांप गई, शायद ठंड से, शायद किसी और एहसास से।
कबीर ने धीरे से उसका हाथ पकड़ा, उसकी उंगलियों को हल्के से छूते हुए अपने करीब खींच लिया। निशा का दिल एक पल के लिए रुक सा गया।
"क्या हम हमेशा यूँ ही मिलते रहेंगे?" निशा ने धीरे से फुसफुसाया।
"अगर तुम चाहो, तो हमेशा," कबीर ने उसके चेहरे पर गिरी बारिश की बूंद को अपने उंगलियों से हटा दिया।
उस एक स्पर्श में जाने कितने अनकहे जज़्बात थे। बारिश तेज़ हो गई थी, लेकिन उनके बीच की नमी अब किसी और एहसास की थी।

Beautiful
ReplyDelete